बड़ा दुःख हुआ आज जब सुबह अख़बार में पढ़ने को मिला की बुरहान वानी की शवयात्रा में हज़ारों लोग इकठ्ठा हुए थे।आखिर क्यों एक आतंकवादी को लोग इतना सम्मान देते हैं कि अपने ही देश के लोग उन्हें देशद्रोही कहना शुरू कर देते हैं? आखिर क्यों हम भूल जाते हैं कि हम एक महान और अखंड देश के नागरिक जहाँ के लोग पिछले 67 साल से आपसी मतभेदों के रहते हुए भी सदा मेलजोल से रहते आये हैं।
जहाँ लोग अपनी माटी ,पशु और खेतों से हद से ज्यादा प्यार करते हैं,आखिर क्यों उसी पुण्यधरा पर वो अपने ही भाइयों को सिर्फ विचारों के न मिलने पर ही सरेआम कत्ल कर देते हैं?शायद राजनीति का बोध और ज्ञान अपने और पराये के भेद को मिटाकर सबको अंजान बना देता है।या फिर हम जान बूझकर ,अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए अंजान बनाए रहते हैं।
अगर हालातों का ईमानदारी से आकलन किया जाये तो पाएंगे कि गलतियां दोनों ही तरफ से हुई हैं।अगर अलगाववादी नेता कश्मीर के सीधे साधे लोगों को बहलाने में कामयाब हो रहे तो कहीं न कहीं हमारी भी गलती हैं।दशकों से लोग सिर्फ अफ्स्पा को हटाने का वादा करने नाम पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं तो धारा 370 के नाम पर हम भी बस राजनीती कर रहे हैं।
जब से भारत में राष्ट्रवादियों☺की सरकार आयी है,कश्मीर में भारत के खिलाफ प्रचार चरम पर हैं।
आये दिन शुक्रवार के दिन नमाज के बाद लोग पुलिस पर पत्थरबाजी करते हैं, ISIS के झंडे फहराये जाते हैं और इस्लाम के नाम पर कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात होती है। भारतीय सेना के खिलाफ प्रदर्शन करने वालो को सम्मानित किया जाता है।
ये सब साबित करता है कि कहीं न कहीं हम अपने अखंड भारत के इरादे के साथ अन्याय कर रहे है।शायद हम स्तिथि की गंभीरता को न समझकर केवल ऊपर से ही समस्या को दबा देना चाहते है। न तो हम स्वीकारना चाहते हैं कि कहीं न कहीं हमारा स्टैंड गलत है हमें उसमे सुधार करने की जरूरत है।हमें सेना के काम करने के तरीके को और भी ज्यादा निष्पक्ष बनाना होगा। वो आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में निर्णय लेने में सक्षम हो,लेकिन साथ ही साथ उनकी जवाबदेही बहुत जरूरी है।
जारी--
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