क्यों बे,आज इंडिपेंडेंस डे पे क्या प्लान है?कप में बची चाय की आखिरी घूँट को खत्म करते हुए मन्नू ने छोटू से पुछा।
क्या भैय्या आपको तो सब पता ही है कि हमको आज के दिन कितना काम रहता है।पहले गाँव के स्कूल जाकर वहाँ कार्यक्रम का बंदोबस्त करना है ,फिर रोज की तरह अपने काम में लग जाना है।क्या है कि हम गरीब लोग बस इससे ज्यादा कुछ नही कर सकते हैं।हम कहाँ आप लोगों की तरह सुबह से शाम तक आजादी के इस उत्सव को मना सकते हैं।प्रश्नवाचक निगाहों के साथ छोटू ने जवाब दिया।
अरे तुम तो सीरियस हो गए ,हम तो बस पूछ रहे थे।मन्नू ने झेंपते हुए कहा।
खैर चलो हम तो चलते हैं,थोडा जरुरी काम है।
कहते हुए मन्नू चला गया।
छोटू जाति से ब्राह्मण और काम से लुहार था। भट्टी से निकले धुएँ से उसकी आँखे मोतियाबन्द की शिकार हो गयी थी।छोटू कभी गोरा चिट्टा ,हट्टा कट्टा नौजवान हुआ करता था लेकिन समय की मार और काम के बोझ ने उसके रुप रंग और कद काठी पर मानो ग्रहण सा लगा दिया था।
वैसे छोटू कभी कुछ ज्यादा सोचता नही था,लेकिन आज न जाने क्यों उसके दिमाग में रह रहकर विचारों का बवंडर उठा जा रहा था।
आखिर क्यों आज भी उसे और उसके जैसे अनगिनत लोगों अभावों से भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।क्यों आज भी लाखों करोडो़ लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है?क्यों आज भी लोगों चंद पैसौं के लिए अपने वजूद को मिटाने के लिए तैयार हो जाते हैं?
क्या इन्हीं दिनों के लिए हमारे वीर पूर्वजों ने अपना बलिदान दिया था।भगत सिंह और नेताजी जो पूरे समाज के उत्थान की बात करते थे,शायद आज उसका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।या फिर कुछ लोगों के लालच ने उस विचारधारा को खत्म कर दिया है।महात्मा गाँधी समाज के सबसे कमजोर तबके को आजादी के आंदोलन में साथ में लेकर चलने की बात कहते थे क्योंकि कहीं न कहीं उन्हे पूर्वाभास हो गया था कि उनके बिना आजादी बस एक सत्ता का हस्तांतरण होकर रह जाएगा।समाज के हर वर्ग को शामिल किए बिना भारत की आजादी अधूरी रह जाएगी।
तभी उधर से निकलती हुई प्रभात फेरी मे उत्साहित बच्चों के नारों ने उसका ध्यान भंग किया और उसको हकीकत में ला खडा किया।उसका हथौडा भट्टी में तपकर बिलकुल लाल हो गया था।
भट्टी से निकलती लौं में लोहे को रखकर छोटू फिर से अपना काम करने में लग जाता है।
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