हिन्दी हमारी मातृभाषा है।माने कि पैदा होने के बाद बोलना शुरु करने तक जुबान पर आने वाला पहला शब्द हिन्दी का ही होता है। माँ हमें अपने विचारों को प्रकट करने का सलीका सिखाती है तो हिन्दी हमें उन विचारों को शब्दों में पिरोने का माध्यम प्रदान करती है। मातृभाषा के इसी उपकार को सम्मान देने के लिए शायद उसे माता का दर्जा दिया गया है। त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम लक्ष्मण को लंका से अयोध्या वापस चलने के लिए मनाते हैं तो इसके पीछे उनका माता,मातृभूमि और मातृभाषा का हिलोरे मार रहा था।
लेकिन आज हिन्दी अपने ही लोगों के बीच बेगानी बनकर रह गयी है। अंग्रेजी और अंग्रेजीयत की दौड़ मे हिन्दी कहीं बहुत पीछे छूट गयी है। दुःख तो इस बात का है कि हिन्दी के पुराने पैरोकार ही आज मातृभाषा दिवस मनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। एक देश जहाँ के अधिकतर लोग अपने कामकाज हिन्दी में करते हों,उसी देश के न्यायालय से अगर आपको न्याय चाहिए तो अर्जी आपको अंग्रेजी में देनी पडे़गी। किसी सरकारी विभाग में अगर हिन्दी में अर्जी दाखिल करें तो आपको हेय दृष्टि से देखा जाता है।
साथ ही रोजमर्रा की दिनचर्या में भी अगर आप अंग्रेजी का प्रयोग नहीं करते तो आपको गँवार माना जाता है। किसी सुंदर से बच्चे को देखकर अगर आप "oh so cute" के बजाय कितना सुंदर बच्चा बोल दें तो आप अपने होने का सबूत दे रहे होते हैं। गर्लफ्रेंड को अगर "I love you baby" की जगह " तुमसे प्यार करते हैं" बोल दें तो शायद प्यार परवान ही ना चढे।
लेकिन जो सिर्फ इसी बेईज्जत होने के डर से ही हिन्दी को प्रयोग में नहीं लाते हैं ,वो वास्तव में हीनभावना से ग्रसित हैं। आप अंग्रेजी में बोलकर अपने "status" को तो बढा सकते हैं, लेकिन आप विचारों को प्रकट करने का लुत्फ नहीं उठा पाएँगे। गारंटी देते हैं किअ हिन्दी में दोस्तो कों गरियाने में, उनकी जिंदगी के अनछुए पहलू को जानने में जो मजा आएगा वो शायद अंग्रेजी अनुवाद से कहीं अधिक जबर और शानदार होगा। एक भारतीय के लिए हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भाव भरे हैं जबकि अंग्रेजी तो महज शब्दों की कमी के चलते एक तुच्छ अनुवाद है।
भाषा कोई भी बेकार या अच्छी नहीं होती है ।हर भाषा का अपना महत्तव होता है।और इंसान को चाहिए कि वो अपनी मातृभाषा को सीखने के साथ ही मन लगाकर सीखे। परंतु अपनी भाषा को पूर्णतः भुलाकर दूसरी भाषा की गुलामी करना निंदनीय हैऔर अवनति का कारण है।
अब निर्णय हम हिंदीभाषियों को लेना है कि हिंदी को उसके योग्य सम्मान देना है या फिर परभाषा की गुलामी करते हुए धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को ही खत्म कर देना है?
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