दीवाली शायद एकमात्र ऐसा पर्व है जो देश के हर कोने में पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। बच्चे ,बूढे और युवा सभी में एक उमंग होती है,एक जोश होता है। पर बच्चों की दीवाली शायद अपने आप में एक अलग ही परंपरा होती है। सारे समाज के तौर तरीकों से अलग हटकर वो अपने अलग ही अंदाज में दीवाली मनाते हैं । तो चलिए ले चलते हैं आपको बच्चों की दुनिया में, जहाँ आपको उनके तौर तरीकों और रीति रिवाज को पास से देखने का और महसूस करने का मौका मिलेगा आपको बस इतना करना है कि आप कुछ समय के लिए अपने दिल और दिमाग को इस दुनिया से हटाना है और इस लेख पर केन्द्रित करना है।
बच्चों की दीवाली दशहरे के दिन रावण दहन के साथ ही शुरु हो जाती है। दशहरे के मेले से खरीदे गए पटाखे फोडने के साथ ही दीवाली आगमन का official declaration हो जाता है।उसके अगले कुछ दिन तो बिलकुल ही मजेदार होते हैं।मिठाई प्रेमियों के लिए तो ये कुछ दिन बिलकुल ही win win situation होते हैं।
अहोई अष्टमी के दिन तो डबल धमाल होता है ,जब माँ हमारे लिए उपवास रखती है और फिर रात में नए कपड़े और खर्च करने के लिए extra pocket money देती है।शरारती बच्चों के लिए तो उधम मचाने का एक सुनहरा मौका होता है क्योंकि इस दिन उनपर लगाम लगाने वाला कोई नहीं होता है। इस सब उधम और शरारत के बीच कब दिन बीत जाते हैं,कुछ पता ही नहीं चलता।
फिर आता है धनतेरस का दिन और दुनिया के लिए इस त्यौहार का चाहे जो भी महत्तव हो अपने लिए तो बस इतना ही मतलब है कि उस दिन से अपना घर की सफाई करने का task शुरु हो जाता है। घर के पूरे क्षेत्रफल को संख्याबल के आधार पर distribute कर दिया जाता है और हर सदस्य को within stipulated time काम पूरा करना होता है। कुछ लोग अपने काम को खुद ही पूरा कर लेते हैं तो कुछ कल के भरोसे छोड़कर finally माँ के काम के बोझ को बढाने में महत्तवपूर्ण योगदान देते हैं।
इस सबके साथ ही पापा के साथ शाम को बाजार जाकर पटाखे और मिठाई खरीदने का कर्त्तव्य बखूबी निभाया जाता है। पटाखों को धूप में रखकर सुखाते समय किसी scientist सा जो feel आता है वो शायद एक युवक और बूढ़े के अनुभवों से कई गुना ज्यादा गहरा होता है। अपने पटाखों को दूसरों से बचाना और दूसरों के पटाखों को चुपके से जला देना भी किसी surgical strike से कम नहीं होता है। खैर वक्त का पहिया चलते रहता है और न जाने कब चुपके से दीवाली आ जाती है।
इसी के साथ ही पटाखे फोड़ने के लिए बेचैनी अपने उच्चतम शिखर को कई बार छूकर मम्मी की डाँट और मार के सहारे ground level पर किसी तरह मेंटेन की जाती है। शाम होते होते कम से कम 2-3times तो कुटाई हो चुकी होती है। खैर किसी तरह मन को नियंत्रण में रखते हुए उचित समय और अवसर का wait किया जाता है। और फिर पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद वितरण के साथ ही इंतजार की घडी़ खत्म हो जाती है। सभी अपने पटाखा stock को बाहर निकालते हैं और फिर शुरु होता है मोहल्ले के लौंडों से competition. ये कम्पीटीशन quantity और quantity दोनों levels पर होता है और इसके विजेता को कोई पुरुस्कार तो नहीं मिलता पर वो साल भर के लिए विजेता का रूतबा तो हासिल कर ही लेता है। competition के खत्म होते होते बच्चे इतने थक चुके होते है कि bed पर लेटते ही निद्रालोक में पहुँच जाते हैं।
सुबह उठकर सबसे पहला काम होता है बिना जले पटाखों को ढूँढ़कर उन्हें फोडना ताकि दीवाली को official विदाई दी जा सके। इस अंतिम रस्म के पूरा होते ही बच्चे नम आँखों से और अगले साल जल्दी आने की दुआ के साथअपने इस प्रिय पर्व को विदा देते हैं।
(और इसी के साथ ही परदा गिरता है।)
शुभ दीपावली।
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