Saturday, 5 November 2016

"फेसबुकिए क्रांतिकारी की कलम से"

एक नया ही ट्रेंड आजकल भारतीय समाज मे देखने को मिल रहा है।और ये वाला जो ट्रे़ड है ना बडा confusing सा है।कभी लगता है कि बहुत सुखद है और देश की उन्नति के लिए बेहद आवश्यक है तो कभी कभी किसी आने वाले अनिष्ट की आशंका को भी पैदा करता है। आप टीवी चलाकर बैठ जाइए और खबरों को कुछ मिनटों तक पूरे ध्यान से सुनकर उसपर मनन करेंगे तो पाएँगे कि काम की खबर तो बस कुछ ही पलों के लिए दिखायी गयी थी,बाकि समय में तो रिपोर्टर अपनी TRP बढ़ाने और अपने राजनैतिक आकाओं को खुश करने की एक ईमानदार कोशिश कर रहा था।अधिकतर टीवी चैनल्स politicians के हैं और इनका पूरा ध्यान अपनी पार्टी की विचारधारा को आगे बढाने पर केन्द्रित होता है। खबरों को अलग अलग नजरिए से analyze करने के लिए analysts लोगों को hire किया होता है जिनकी salary इस बात पर निर्भर करती है कि वो कितनी मजबूती और बेईमानी के साथ खबर को पार्टी के पक्ष में वोट लाने का जरिया बनाने का सुझाव दे। उसके बाद शुरु होता है जनता को भ्रमित करने का दौर जहाँ खबरों को नमक मिर्च लगाकर परोसा जाता है।फिर शुरू होता है सोशल मीडिया पर खबर को चलाने का दौर ,twitter पर हैशटेग ट्रेंड कराया जाता है,फेसबुक और न जाने कितने तकनीकी माध्यमों का सहारा लेकर सहानुभूति gain करने की कोशिश की जाती है। इन लोगों का सबसे मुश्किल और आसान सा लक्ष्य होता है देश की युवा आबादी के गढ़ में सेंध लगाना ताकि topic को ज्यादा से ज्यादा trend कराया जाता है।
बस यहीं से आशंकाओं के बादल छँट जाते हैं और फिर शुरू होता है जान बूझकर रायता फैलाने का दौर। नौजवान अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखते हुए इतना भयानक ज्ञान बाँटते हैं कि एक बार को तो आचार्य चाणक्य को भी अपनी प्रतिभा पर संदेह होने लगे। अपने विचारों को निर्विरोध रुप से आगे बढाने के लिए ओपन लेटर्स लिखे जाते हैं।ओपन लेटर शायद आज तक का सबसे कारगर हथियार है जहाँ आप ओपनली अपने विरोधी को उसकी औकात दिखा सकते हैं और बन्दा आपको कुछ नुकसान भी नहीं  पहुँचा पाएगा। फिर फेसबुक पर लम्बे पोस्ट लिखकर कुछ लौंडे दोस्तों के बीच कूल डूड बनने की एक नाकाम सी कोशिश करते हैं।
अगर संयोगवश economical मुद्दे पर बहस हो जाए तो लौंडे economics का इतना लम्बा लेक्चर झाड़ देंगे कि देश का वित्त मंत्री भी पानी माँगने लगे।खैर ये वही लौंडे होते हैं जो जिनको हाईस्कूल में आयात निर्यात माने import-export तक का मतलब  नहीं पता होता है। लेकिन फेसबुक बाबा के प्रताप से सब साल छह महीने में ही Raghuram rajan सरीखे मंझे हुए economists को मात देने लग जाते हैं।
मामला अगर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो तो इतना सटीक सॉल्यूशन देते हैं कि intelligence bureau और NIA वाले भी कायल हो जाएँ।खैर वो अलग बात है कि ये वाला सॉल्यूशन रियल लाईफ में बिलकुल feasible नही होता है,लेकिन कम से कम लौंडे को फ्रेंडस सर्कल में तो AJIT DOVAL वाली औकात मिल ही जाती है।

और अगर गलती से कोई इनकी पोस्ट के विरोध में कुछ कह दे तो इनकी आँखों में खून उतर आता है। विरोधी की फेसबुक टाईमलाईन और न जाने कहाँ कहाँ से उसके दोगलेपन को साबित करने वाली पुरानी पोस्टस को धडल्ले से लाईक,कमेंट और शेयर किया जाता है।
और इस तरह से दोनों वर्चुअल वार मोड में एंटर कर जाते हैं।
फिर जो गाली और  शानदार एडजेक्टिव्स लगाकर एक दूसरे को  गरियाने का दौर शुरु होता  होता है वो रियल लाईफ जूतम पैजार के साथ ही खत्म होता है। किसी का हाथ टूटता है तो कोई 2-4महीने के लिए permanently बिस्तर को पकड़ लेता है।
इस रियल लाईफ एटवेंचर के साथ ही सारा कूल डूड बनने का भूत उतर जाता है और फिर किसी  तरह जान बचाकर भागने तक की नौबत आ जाती है।
खैर इंसान जिंदगी में गलती करता है और फिर गलती से कुछ सीख लेता है। तो इधर वाले एडवेंचर से इंसान सीख लेता है कि गुरू,चाहे जो हो जाए ,(रवीश कुमार हर मामले को जाति से जोडकर रिपोर्टिंग करना बंद कर दे या अर्नब गोस्वामी"द नेशन वाँट्स टू नो" वाली बकचोदी बंद करदे या फिर Times of India "सेंसिबल रिपोर्टिंग "शुरु कर दे या फिर एक्सट्रीम केस में KRK लोगों से गाली खाना बंद कर दे।😊)हमको तो भैय्या बस बीच वाले रास्ते से खम्भा बचाके निकल लेना है। क्योंकि गुरु अगर लेफ्ट राईट के चक्कर में फंसकर रह गये ना,तो इहलोक में शांति से रह ही नहीं पाओगे और परलोक बिगडेगा सो अलग।

डिस्कलमरः इस लेख का वास्तविक स्थान ,घटना और व्यक्तियों से कोई संबंध नही है ,अगर कोई संबंध पाया जाता है तो इसे मात्र एक संयोग माना जाए। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को हर्ट करना नहीं है लकिन अगर होती हैं तो होती रहें क्योंकि गुरु रियल लाईफ में तो तुम मेरा घंटा कुछ उखाड़ पाओगे।

ओउम तत्सत।

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