Sunday, 31 July 2016

आइस्क्रीम वाला

"कुल्फी ले लो,कुल्फी"। उसकी कर्ण कटु आवाज भी बच्चो को उसकी तरफ खिंचा चला आने से रोक न पाती थी।  उसकी आवाज हाँलाकि उसके काम के साथ मिलती नही थी।और न ही उसका व्यवसाय उसे तेज आवाज में चिल्लाने की आज्ञा देता था। पर उसका अनपढ़ होना और फेरी लगाकर कुल्फी बेचना,सबको उसकी गलती माफ करने को मजबूर कर देता था।
पुराना सा फटा कुर्ता,सफेद धोती जो वक्त के साथ मटमैले रँग की हो गयी है,माथे पर गरमी से बचने के लिए साफा,ये सब उसकी वेशभूषा थी।

गाँव में घुसते ही सबसे पहले वो बडे बूढों का अभिवादन करता ,फिर मोहल्ले के उस बडे से चौक पर डेरा जमाकर बैठ जाता। फिर अपनी संगीतमय लेकिन कर्कश  आवाज मे कुल्फी ले लो कुल्फी ,कहना शुरु करता। उसकी यह आवाज भरी दुपहरी में पसीने से तरबतर बच्चों के लिए एक सुकून देने वाली ठंडी हवा की तरह थी। बच्चे  तुरंत अपना खेल छोडकर कुल्फी वाले की तरफ दौड पडते।फिर शुरू होती कुल्फी के लिए मारामारी। हर कोई सबसे पहले कुल्फी खरीदकर बाकी दोस्तों को अपनी गर्वपूर्ण मुस्कान से चिढ़ाना चाहता।शायद जल्दी कुल्फी पा लेने की खुशी का अनुभव सिकंदर के विश्व विजय की खुशी से भी ज्यादा कीमती था।खैर आखिर मे लड़ते झगडते,धक्का मुक्की करते सब अपना हिस्सा पा ही लेते।और फिर शुरु होता मिल बैठकर खाने का दौर।शर्त लगाते ,छीना झपटी करते जाने कब कुल्फी खत्म हो जाती।और फिर अपने खेल खेलने लौट जाते।
लेकिन इस सब के बीच कुल्फी वाले को एक असीम आनंद की अनुभूति होती थी।और हो भी क्यों न?आखिर वो इतने सारे बच्चों से दुआ जो पाता था।

आज करीब 20 साल हो गये उसको उस गाँव में आते हुए। तब से अब तक कितना कुछ बदल गया है। बच्चे जो कभी उसके पास कुल्फी खाने आते थे ,आज खुद बाल बच्चों वाले हो गए हैं। कुछ तो बेचारे भगवान को प्यारे हो गये और बाकी वृद्धावस्था में बस भगवत भजन में लगे हैं।
परन्तु सबसे बड़ा परिवर्तन तो बच्चों में आया है। न तो बच्चे अब दोपहर में खेलने आते हैं और न ही आइस्क्रीम खाने आते हैं। कार्टून और बिगबाजार की संस्कृति ने उसके अस्तित्व को कहीं मिट्टी मे मिला दिया है। निराशा और चिढ के मारे अब वो उस गाँव में एक पल नहीं रूकना चाहता था।
"शायद मुझे भी अब अपना धंधा बदल लेना चाहिए"मन ही मन सोचते हुए वो अपनी कुल्फी की पेटी को साईकिल पर रखकर चला गया।।

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