Wednesday, 9 November 2016
डोनाल्ड ट्र्म्प होने के मायने
Saturday, 5 November 2016
"फेसबुकिए क्रांतिकारी की कलम से"
एक नया ही ट्रेंड आजकल भारतीय समाज मे देखने को मिल रहा है।और ये वाला जो ट्रे़ड है ना बडा confusing सा है।कभी लगता है कि बहुत सुखद है और देश की उन्नति के लिए बेहद आवश्यक है तो कभी कभी किसी आने वाले अनिष्ट की आशंका को भी पैदा करता है। आप टीवी चलाकर बैठ जाइए और खबरों को कुछ मिनटों तक पूरे ध्यान से सुनकर उसपर मनन करेंगे तो पाएँगे कि काम की खबर तो बस कुछ ही पलों के लिए दिखायी गयी थी,बाकि समय में तो रिपोर्टर अपनी TRP बढ़ाने और अपने राजनैतिक आकाओं को खुश करने की एक ईमानदार कोशिश कर रहा था।अधिकतर टीवी चैनल्स politicians के हैं और इनका पूरा ध्यान अपनी पार्टी की विचारधारा को आगे बढाने पर केन्द्रित होता है। खबरों को अलग अलग नजरिए से analyze करने के लिए analysts लोगों को hire किया होता है जिनकी salary इस बात पर निर्भर करती है कि वो कितनी मजबूती और बेईमानी के साथ खबर को पार्टी के पक्ष में वोट लाने का जरिया बनाने का सुझाव दे। उसके बाद शुरु होता है जनता को भ्रमित करने का दौर जहाँ खबरों को नमक मिर्च लगाकर परोसा जाता है।फिर शुरू होता है सोशल मीडिया पर खबर को चलाने का दौर ,twitter पर हैशटेग ट्रेंड कराया जाता है,फेसबुक और न जाने कितने तकनीकी माध्यमों का सहारा लेकर सहानुभूति gain करने की कोशिश की जाती है। इन लोगों का सबसे मुश्किल और आसान सा लक्ष्य होता है देश की युवा आबादी के गढ़ में सेंध लगाना ताकि topic को ज्यादा से ज्यादा trend कराया जाता है।
बस यहीं से आशंकाओं के बादल छँट जाते हैं और फिर शुरू होता है जान बूझकर रायता फैलाने का दौर। नौजवान अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखते हुए इतना भयानक ज्ञान बाँटते हैं कि एक बार को तो आचार्य चाणक्य को भी अपनी प्रतिभा पर संदेह होने लगे। अपने विचारों को निर्विरोध रुप से आगे बढाने के लिए ओपन लेटर्स लिखे जाते हैं।ओपन लेटर शायद आज तक का सबसे कारगर हथियार है जहाँ आप ओपनली अपने विरोधी को उसकी औकात दिखा सकते हैं और बन्दा आपको कुछ नुकसान भी नहीं पहुँचा पाएगा। फिर फेसबुक पर लम्बे पोस्ट लिखकर कुछ लौंडे दोस्तों के बीच कूल डूड बनने की एक नाकाम सी कोशिश करते हैं।
अगर संयोगवश economical मुद्दे पर बहस हो जाए तो लौंडे economics का इतना लम्बा लेक्चर झाड़ देंगे कि देश का वित्त मंत्री भी पानी माँगने लगे।खैर ये वही लौंडे होते हैं जो जिनको हाईस्कूल में आयात निर्यात माने import-export तक का मतलब नहीं पता होता है। लेकिन फेसबुक बाबा के प्रताप से सब साल छह महीने में ही Raghuram rajan सरीखे मंझे हुए economists को मात देने लग जाते हैं।
मामला अगर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो तो इतना सटीक सॉल्यूशन देते हैं कि intelligence bureau और NIA वाले भी कायल हो जाएँ।खैर वो अलग बात है कि ये वाला सॉल्यूशन रियल लाईफ में बिलकुल feasible नही होता है,लेकिन कम से कम लौंडे को फ्रेंडस सर्कल में तो AJIT DOVAL वाली औकात मिल ही जाती है।
और अगर गलती से कोई इनकी पोस्ट के विरोध में कुछ कह दे तो इनकी आँखों में खून उतर आता है। विरोधी की फेसबुक टाईमलाईन और न जाने कहाँ कहाँ से उसके दोगलेपन को साबित करने वाली पुरानी पोस्टस को धडल्ले से लाईक,कमेंट और शेयर किया जाता है।
और इस तरह से दोनों वर्चुअल वार मोड में एंटर कर जाते हैं।
फिर जो गाली और शानदार एडजेक्टिव्स लगाकर एक दूसरे को गरियाने का दौर शुरु होता होता है वो रियल लाईफ जूतम पैजार के साथ ही खत्म होता है। किसी का हाथ टूटता है तो कोई 2-4महीने के लिए permanently बिस्तर को पकड़ लेता है।
इस रियल लाईफ एटवेंचर के साथ ही सारा कूल डूड बनने का भूत उतर जाता है और फिर किसी तरह जान बचाकर भागने तक की नौबत आ जाती है।
खैर इंसान जिंदगी में गलती करता है और फिर गलती से कुछ सीख लेता है। तो इधर वाले एडवेंचर से इंसान सीख लेता है कि गुरू,चाहे जो हो जाए ,(रवीश कुमार हर मामले को जाति से जोडकर रिपोर्टिंग करना बंद कर दे या अर्नब गोस्वामी"द नेशन वाँट्स टू नो" वाली बकचोदी बंद करदे या फिर Times of India "सेंसिबल रिपोर्टिंग "शुरु कर दे या फिर एक्सट्रीम केस में KRK लोगों से गाली खाना बंद कर दे।😊)हमको तो भैय्या बस बीच वाले रास्ते से खम्भा बचाके निकल लेना है। क्योंकि गुरु अगर लेफ्ट राईट के चक्कर में फंसकर रह गये ना,तो इहलोक में शांति से रह ही नहीं पाओगे और परलोक बिगडेगा सो अलग।
डिस्कलमरः इस लेख का वास्तविक स्थान ,घटना और व्यक्तियों से कोई संबंध नही है ,अगर कोई संबंध पाया जाता है तो इसे मात्र एक संयोग माना जाए। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को हर्ट करना नहीं है लकिन अगर होती हैं तो होती रहें क्योंकि गुरु रियल लाईफ में तो तुम मेरा घंटा कुछ उखाड़ पाओगे।
ओउम तत्सत।
Saturday, 29 October 2016
बचपन की एक दीपावली
दीवाली शायद एकमात्र ऐसा पर्व है जो देश के हर कोने में पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। बच्चे ,बूढे और युवा सभी में एक उमंग होती है,एक जोश होता है। पर बच्चों की दीवाली शायद अपने आप में एक अलग ही परंपरा होती है। सारे समाज के तौर तरीकों से अलग हटकर वो अपने अलग ही अंदाज में दीवाली मनाते हैं । तो चलिए ले चलते हैं आपको बच्चों की दुनिया में, जहाँ आपको उनके तौर तरीकों और रीति रिवाज को पास से देखने का और महसूस करने का मौका मिलेगा आपको बस इतना करना है कि आप कुछ समय के लिए अपने दिल और दिमाग को इस दुनिया से हटाना है और इस लेख पर केन्द्रित करना है।
बच्चों की दीवाली दशहरे के दिन रावण दहन के साथ ही शुरु हो जाती है। दशहरे के मेले से खरीदे गए पटाखे फोडने के साथ ही दीवाली आगमन का official declaration हो जाता है।उसके अगले कुछ दिन तो बिलकुल ही मजेदार होते हैं।मिठाई प्रेमियों के लिए तो ये कुछ दिन बिलकुल ही win win situation होते हैं।
अहोई अष्टमी के दिन तो डबल धमाल होता है ,जब माँ हमारे लिए उपवास रखती है और फिर रात में नए कपड़े और खर्च करने के लिए extra pocket money देती है।शरारती बच्चों के लिए तो उधम मचाने का एक सुनहरा मौका होता है क्योंकि इस दिन उनपर लगाम लगाने वाला कोई नहीं होता है। इस सब उधम और शरारत के बीच कब दिन बीत जाते हैं,कुछ पता ही नहीं चलता।
फिर आता है धनतेरस का दिन और दुनिया के लिए इस त्यौहार का चाहे जो भी महत्तव हो अपने लिए तो बस इतना ही मतलब है कि उस दिन से अपना घर की सफाई करने का task शुरु हो जाता है। घर के पूरे क्षेत्रफल को संख्याबल के आधार पर distribute कर दिया जाता है और हर सदस्य को within stipulated time काम पूरा करना होता है। कुछ लोग अपने काम को खुद ही पूरा कर लेते हैं तो कुछ कल के भरोसे छोड़कर finally माँ के काम के बोझ को बढाने में महत्तवपूर्ण योगदान देते हैं।
इस सबके साथ ही पापा के साथ शाम को बाजार जाकर पटाखे और मिठाई खरीदने का कर्त्तव्य बखूबी निभाया जाता है। पटाखों को धूप में रखकर सुखाते समय किसी scientist सा जो feel आता है वो शायद एक युवक और बूढ़े के अनुभवों से कई गुना ज्यादा गहरा होता है। अपने पटाखों को दूसरों से बचाना और दूसरों के पटाखों को चुपके से जला देना भी किसी surgical strike से कम नहीं होता है। खैर वक्त का पहिया चलते रहता है और न जाने कब चुपके से दीवाली आ जाती है।
इसी के साथ ही पटाखे फोड़ने के लिए बेचैनी अपने उच्चतम शिखर को कई बार छूकर मम्मी की डाँट और मार के सहारे ground level पर किसी तरह मेंटेन की जाती है। शाम होते होते कम से कम 2-3times तो कुटाई हो चुकी होती है। खैर किसी तरह मन को नियंत्रण में रखते हुए उचित समय और अवसर का wait किया जाता है। और फिर पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद वितरण के साथ ही इंतजार की घडी़ खत्म हो जाती है। सभी अपने पटाखा stock को बाहर निकालते हैं और फिर शुरु होता है मोहल्ले के लौंडों से competition. ये कम्पीटीशन quantity और quantity दोनों levels पर होता है और इसके विजेता को कोई पुरुस्कार तो नहीं मिलता पर वो साल भर के लिए विजेता का रूतबा तो हासिल कर ही लेता है। competition के खत्म होते होते बच्चे इतने थक चुके होते है कि bed पर लेटते ही निद्रालोक में पहुँच जाते हैं।
सुबह उठकर सबसे पहला काम होता है बिना जले पटाखों को ढूँढ़कर उन्हें फोडना ताकि दीवाली को official विदाई दी जा सके। इस अंतिम रस्म के पूरा होते ही बच्चे नम आँखों से और अगले साल जल्दी आने की दुआ के साथअपने इस प्रिय पर्व को विदा देते हैं।
(और इसी के साथ ही परदा गिरता है।)
शुभ दीपावली।
Friday, 14 October 2016
The unmaking of a nation named Pakistan
Once the Union of states were formed and Princely states were abolished,next challenge was to decide the fate of people. At that time both India and Pakistan choose to become Democracies where people were free to elect their representatives.Thus began the journey of two brothers who inherited a good amount of cultural and wealthy heritage as well as fuedal mindset. While the elder one kept on improvising the old ideas and worked towards the upliftment of people the younger one choose experimentation to see where it will lead him.There are numerous examples of success and failures in the history of Pakistan.So let us examine one by one the different experiments done by Pakistan and analyze where she could have done better and where she could not do any worse.
Since then it has been a normal sight that Pakistani army meddles into the affairs of the government. Whenever Pakistan faces a crisis,the Army and ISI take the charge.This has happened before and no one should be shocked if NAWAJ SHARIF government is overthrown some day.
Well India was bifurcated just for the sake of religion and Pakistan was supposed to be a Islamic nation.And the things followed the same.But very soon the become too much obsessed with religion. Forceful conversions and killling minorities became very common.This mass killing and forcible conversion drastically reduced the minority population. Moreover Mullas started following Wahabism and tried to connect themselves to Arabic identity.This led to boycott of the people who did not connect themselves to Arabic identity.They were denied to follow their Muslim religion.
Also Maulanas started taking active part in the policymaking process which led to disastrous results such as giving shelter to Terrorists and providing them a safe heaven.So the conclusion is that they religion so much importance that it cornered even the government.
Pakistan has always been obsessed by the idea of spreading terror to get its ambitions fulfilled. The very first example of this approach can be traced back in the attack of Pakistan supported Kabailis on Jammu and Kashmir.Their tribal savages looted and massacred the masses of Kashmir just to ensure the accession of this Princely state to Pakistan.
Moreover it has always supported the secessionist Khalistani and separatist leaders of Jammu and Kashmir to wage a war against Indian Union.
But India is not the single enemy against whom Pakistan uses Terrorism as proxy offensive defense.Afghanistan is worst affected by Terrorism. After Afghanistan successfully pushed Taliban outside its territory,Pakistan became the obvious choice of terrorists. Now most of the terrorist camps are either situated close to India border or Afghanistan border.Jihadis get trained there ,they sneak into the enemy territory,complete their task and return back to their hidden camps.
But recently Pakistan itself has fallen prey to its old tactics.Terror attack on Army school in Peshawar ,Never ending attacks on religious congregations remind Pakistan that one who digs pit for others falls into it.
The amalgamation of politics,religion and military dominance still haunts the democracy and decision making capacity of legislation. Those who asked for the division of united India must have never thought of finding their country in such a bad state of affairs. They had a vision of a happy , prosperous and ever growing country which will have a dignified rank among the top nations of the world.
Wednesday, 14 September 2016
हिन्दीःमातृभाषा या मात्रभाषा
हिन्दी हमारी मातृभाषा है।माने कि पैदा होने के बाद बोलना शुरु करने तक जुबान पर आने वाला पहला शब्द हिन्दी का ही होता है। माँ हमें अपने विचारों को प्रकट करने का सलीका सिखाती है तो हिन्दी हमें उन विचारों को शब्दों में पिरोने का माध्यम प्रदान करती है। मातृभाषा के इसी उपकार को सम्मान देने के लिए शायद उसे माता का दर्जा दिया गया है। त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम लक्ष्मण को लंका से अयोध्या वापस चलने के लिए मनाते हैं तो इसके पीछे उनका माता,मातृभूमि और मातृभाषा का हिलोरे मार रहा था।
लेकिन आज हिन्दी अपने ही लोगों के बीच बेगानी बनकर रह गयी है। अंग्रेजी और अंग्रेजीयत की दौड़ मे हिन्दी कहीं बहुत पीछे छूट गयी है। दुःख तो इस बात का है कि हिन्दी के पुराने पैरोकार ही आज मातृभाषा दिवस मनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। एक देश जहाँ के अधिकतर लोग अपने कामकाज हिन्दी में करते हों,उसी देश के न्यायालय से अगर आपको न्याय चाहिए तो अर्जी आपको अंग्रेजी में देनी पडे़गी। किसी सरकारी विभाग में अगर हिन्दी में अर्जी दाखिल करें तो आपको हेय दृष्टि से देखा जाता है।
साथ ही रोजमर्रा की दिनचर्या में भी अगर आप अंग्रेजी का प्रयोग नहीं करते तो आपको गँवार माना जाता है। किसी सुंदर से बच्चे को देखकर अगर आप "oh so cute" के बजाय कितना सुंदर बच्चा बोल दें तो आप अपने होने का सबूत दे रहे होते हैं। गर्लफ्रेंड को अगर "I love you baby" की जगह " तुमसे प्यार करते हैं" बोल दें तो शायद प्यार परवान ही ना चढे।
लेकिन जो सिर्फ इसी बेईज्जत होने के डर से ही हिन्दी को प्रयोग में नहीं लाते हैं ,वो वास्तव में हीनभावना से ग्रसित हैं। आप अंग्रेजी में बोलकर अपने "status" को तो बढा सकते हैं, लेकिन आप विचारों को प्रकट करने का लुत्फ नहीं उठा पाएँगे। गारंटी देते हैं किअ हिन्दी में दोस्तो कों गरियाने में, उनकी जिंदगी के अनछुए पहलू को जानने में जो मजा आएगा वो शायद अंग्रेजी अनुवाद से कहीं अधिक जबर और शानदार होगा। एक भारतीय के लिए हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भाव भरे हैं जबकि अंग्रेजी तो महज शब्दों की कमी के चलते एक तुच्छ अनुवाद है।
भाषा कोई भी बेकार या अच्छी नहीं होती है ।हर भाषा का अपना महत्तव होता है।और इंसान को चाहिए कि वो अपनी मातृभाषा को सीखने के साथ ही मन लगाकर सीखे। परंतु अपनी भाषा को पूर्णतः भुलाकर दूसरी भाषा की गुलामी करना निंदनीय हैऔर अवनति का कारण है।
अब निर्णय हम हिंदीभाषियों को लेना है कि हिंदी को उसके योग्य सम्मान देना है या फिर परभाषा की गुलामी करते हुए धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को ही खत्म कर देना है?
Sunday, 14 August 2016
स्वतंत्रता दिवस
क्यों बे,आज इंडिपेंडेंस डे पे क्या प्लान है?कप में बची चाय की आखिरी घूँट को खत्म करते हुए मन्नू ने छोटू से पुछा।
क्या भैय्या आपको तो सब पता ही है कि हमको आज के दिन कितना काम रहता है।पहले गाँव के स्कूल जाकर वहाँ कार्यक्रम का बंदोबस्त करना है ,फिर रोज की तरह अपने काम में लग जाना है।क्या है कि हम गरीब लोग बस इससे ज्यादा कुछ नही कर सकते हैं।हम कहाँ आप लोगों की तरह सुबह से शाम तक आजादी के इस उत्सव को मना सकते हैं।प्रश्नवाचक निगाहों के साथ छोटू ने जवाब दिया।
अरे तुम तो सीरियस हो गए ,हम तो बस पूछ रहे थे।मन्नू ने झेंपते हुए कहा।
खैर चलो हम तो चलते हैं,थोडा जरुरी काम है।
कहते हुए मन्नू चला गया।
छोटू जाति से ब्राह्मण और काम से लुहार था। भट्टी से निकले धुएँ से उसकी आँखे मोतियाबन्द की शिकार हो गयी थी।छोटू कभी गोरा चिट्टा ,हट्टा कट्टा नौजवान हुआ करता था लेकिन समय की मार और काम के बोझ ने उसके रुप रंग और कद काठी पर मानो ग्रहण सा लगा दिया था।
वैसे छोटू कभी कुछ ज्यादा सोचता नही था,लेकिन आज न जाने क्यों उसके दिमाग में रह रहकर विचारों का बवंडर उठा जा रहा था।
आखिर क्यों आज भी उसे और उसके जैसे अनगिनत लोगों अभावों से भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।क्यों आज भी लाखों करोडो़ लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है?क्यों आज भी लोगों चंद पैसौं के लिए अपने वजूद को मिटाने के लिए तैयार हो जाते हैं?
क्या इन्हीं दिनों के लिए हमारे वीर पूर्वजों ने अपना बलिदान दिया था।भगत सिंह और नेताजी जो पूरे समाज के उत्थान की बात करते थे,शायद आज उसका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।या फिर कुछ लोगों के लालच ने उस विचारधारा को खत्म कर दिया है।महात्मा गाँधी समाज के सबसे कमजोर तबके को आजादी के आंदोलन में साथ में लेकर चलने की बात कहते थे क्योंकि कहीं न कहीं उन्हे पूर्वाभास हो गया था कि उनके बिना आजादी बस एक सत्ता का हस्तांतरण होकर रह जाएगा।समाज के हर वर्ग को शामिल किए बिना भारत की आजादी अधूरी रह जाएगी।
तभी उधर से निकलती हुई प्रभात फेरी मे उत्साहित बच्चों के नारों ने उसका ध्यान भंग किया और उसको हकीकत में ला खडा किया।उसका हथौडा भट्टी में तपकर बिलकुल लाल हो गया था।
भट्टी से निकलती लौं में लोहे को रखकर छोटू फिर से अपना काम करने में लग जाता है।
Sunday, 31 July 2016
आइस्क्रीम वाला
"कुल्फी ले लो,कुल्फी"। उसकी कर्ण कटु आवाज भी बच्चो को उसकी तरफ खिंचा चला आने से रोक न पाती थी। उसकी आवाज हाँलाकि उसके काम के साथ मिलती नही थी।और न ही उसका व्यवसाय उसे तेज आवाज में चिल्लाने की आज्ञा देता था। पर उसका अनपढ़ होना और फेरी लगाकर कुल्फी बेचना,सबको उसकी गलती माफ करने को मजबूर कर देता था।
पुराना सा फटा कुर्ता,सफेद धोती जो वक्त के साथ मटमैले रँग की हो गयी है,माथे पर गरमी से बचने के लिए साफा,ये सब उसकी वेशभूषा थी।
गाँव में घुसते ही सबसे पहले वो बडे बूढों का अभिवादन करता ,फिर मोहल्ले के उस बडे से चौक पर डेरा जमाकर बैठ जाता। फिर अपनी संगीतमय लेकिन कर्कश आवाज मे कुल्फी ले लो कुल्फी ,कहना शुरु करता। उसकी यह आवाज भरी दुपहरी में पसीने से तरबतर बच्चों के लिए एक सुकून देने वाली ठंडी हवा की तरह थी। बच्चे तुरंत अपना खेल छोडकर कुल्फी वाले की तरफ दौड पडते।फिर शुरू होती कुल्फी के लिए मारामारी। हर कोई सबसे पहले कुल्फी खरीदकर बाकी दोस्तों को अपनी गर्वपूर्ण मुस्कान से चिढ़ाना चाहता।शायद जल्दी कुल्फी पा लेने की खुशी का अनुभव सिकंदर के विश्व विजय की खुशी से भी ज्यादा कीमती था।खैर आखिर मे लड़ते झगडते,धक्का मुक्की करते सब अपना हिस्सा पा ही लेते।और फिर शुरु होता मिल बैठकर खाने का दौर।शर्त लगाते ,छीना झपटी करते जाने कब कुल्फी खत्म हो जाती।और फिर अपने खेल खेलने लौट जाते।
लेकिन इस सब के बीच कुल्फी वाले को एक असीम आनंद की अनुभूति होती थी।और हो भी क्यों न?आखिर वो इतने सारे बच्चों से दुआ जो पाता था।
आज करीब 20 साल हो गये उसको उस गाँव में आते हुए। तब से अब तक कितना कुछ बदल गया है। बच्चे जो कभी उसके पास कुल्फी खाने आते थे ,आज खुद बाल बच्चों वाले हो गए हैं। कुछ तो बेचारे भगवान को प्यारे हो गये और बाकी वृद्धावस्था में बस भगवत भजन में लगे हैं।
परन्तु सबसे बड़ा परिवर्तन तो बच्चों में आया है। न तो बच्चे अब दोपहर में खेलने आते हैं और न ही आइस्क्रीम खाने आते हैं। कार्टून और बिगबाजार की संस्कृति ने उसके अस्तित्व को कहीं मिट्टी मे मिला दिया है। निराशा और चिढ के मारे अब वो उस गाँव में एक पल नहीं रूकना चाहता था।
"शायद मुझे भी अब अपना धंधा बदल लेना चाहिए"मन ही मन सोचते हुए वो अपनी कुल्फी की पेटी को साईकिल पर रखकर चला गया।।
Friday, 15 July 2016
बड़ा दुःख हुआ आज जब सुबह अख़बार में पढ़ने को मिला की बुरहान वानी की शवयात्रा में हज़ारों लोग इकठ्ठा हुए थे।आखिर क्यों एक आतंकवादी को लोग इतना सम्मान देते हैं कि अपने ही देश के लोग उन्हें देशद्रोही कहना शुरू कर देते हैं? आखिर क्यों हम भूल जाते हैं कि हम एक महान और अखंड देश के नागरिक जहाँ के लोग पिछले 67 साल से आपसी मतभेदों के रहते हुए भी सदा मेलजोल से रहते आये हैं।
जहाँ लोग अपनी माटी ,पशु और खेतों से हद से ज्यादा प्यार करते हैं,आखिर क्यों उसी पुण्यधरा पर वो अपने ही भाइयों को सिर्फ विचारों के न मिलने पर ही सरेआम कत्ल कर देते हैं?शायद राजनीति का बोध और ज्ञान अपने और पराये के भेद को मिटाकर सबको अंजान बना देता है।या फिर हम जान बूझकर ,अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए अंजान बनाए रहते हैं।
अगर हालातों का ईमानदारी से आकलन किया जाये तो पाएंगे कि गलतियां दोनों ही तरफ से हुई हैं।अगर अलगाववादी नेता कश्मीर के सीधे साधे लोगों को बहलाने में कामयाब हो रहे तो कहीं न कहीं हमारी भी गलती हैं।दशकों से लोग सिर्फ अफ्स्पा को हटाने का वादा करने नाम पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं तो धारा 370 के नाम पर हम भी बस राजनीती कर रहे हैं।
जब से भारत में राष्ट्रवादियों☺की सरकार आयी है,कश्मीर में भारत के खिलाफ प्रचार चरम पर हैं।
आये दिन शुक्रवार के दिन नमाज के बाद लोग पुलिस पर पत्थरबाजी करते हैं, ISIS के झंडे फहराये जाते हैं और इस्लाम के नाम पर कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात होती है। भारतीय सेना के खिलाफ प्रदर्शन करने वालो को सम्मानित किया जाता है।
ये सब साबित करता है कि कहीं न कहीं हम अपने अखंड भारत के इरादे के साथ अन्याय कर रहे है।शायद हम स्तिथि की गंभीरता को न समझकर केवल ऊपर से ही समस्या को दबा देना चाहते है। न तो हम स्वीकारना चाहते हैं कि कहीं न कहीं हमारा स्टैंड गलत है हमें उसमे सुधार करने की जरूरत है।हमें सेना के काम करने के तरीके को और भी ज्यादा निष्पक्ष बनाना होगा। वो आतंकवादी हमले के सम्बन्ध में निर्णय लेने में सक्षम हो,लेकिन साथ ही साथ उनकी जवाबदेही बहुत जरूरी है।
जारी--
Sunday, 1 May 2016
जूते की आत्मकथा
मैं शायद मानवमात्र द्वारा उपयोग किया जाने वाली उन चीज़ों में से एक हूँ ,जिन्हे हर कोई जाति ,धर्म ,और क्षेत्र के भेदभाव को भूलकर प्रयोग करता है। गरीब अमीर ,छोटा बड़ा हर कोई मुझे है। प्राचीनकाल से ही मैं मनुष्य का सुख दुःख ,गर्मी सर्दी ,हर मौसम का साथी रहा हूँ। मेरे सहारे ही लोग दुर्गम और काँटों से भरे रस्ते को बिना आह निकाले ही कितनी आसानी से पार कर जाते हैं। जब जब किसी पर विरोधी पक्ष से कोई संकट आता है ,तो लोग सबसे पहले दुश्मन के पैरों में मुझे ही पकड़कर अपनी जान बचने की कोशिश करते हैं। इतना सब पढ़ने के बाद शायद आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे कि आप किसके बारे में पढ़ने जा रहे हैं?
फिर भी विषय को स्पष्ट करने के लिए बता दूँ कि आप एक जूते की आत्मकथा पढ़ने जा रहे हैं !!शायद पिछली दो पंक्तियों को पढ़ने पर आपको लगे कि कोई मजाक कर रहा है,भला एक जूता कैसे कुछ सोच,बोल और लिख सकता है ?
परन्तु वास्तविकता यही है की आज एक जूता अपनी आत्मकथा लिखने जा रह है। ये सब संभव है क्योंकि अगर मुझे पहनकर कोई उन दुर्गम और वीरान तथा असंभव से दिखाई देने वाले रास्तों को नाप सकते हैं ,तो एक जूते के अपनी आत्मकथा लिखने में किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए!
मेरे मनमोहक बनावट के आधार पर मेरा मूल्य निर्धारित किया जाता है। संभ्रांत वर्ग के लोग मेरे किसी विशेष डिज़ाइन को पाने के लिए लाखों करोडो रुपये खर्च कर देते हैं। वहीँ दूसरी ओऱ गरीब लोग अधिकतर समय सिर्फ उपयोग के आधार पर ही मुझे खरीदते हैं।
फिर मेरी निर्माण सामग्री के आधार के आधार पर भी वर्गीकृत किया गया है।चमड़े के जूते,कैनवस के जूते,कपडे के जूते और न जाने कितने प्रकार की सामग्री से मुझे बनाया जाता है।